ज्योतिर्विद श्री रविशराय गौड़ से जानिये क्या है दीपावली, पूजा का सही समय और तरीका जानिये

दीपावली का महापर्व पर महालक्ष्मी पूजन व कार्तिक कृष्ण पक्ष की अमावस्या में प्रदोष काल, स्थिर लग्न समय में किया जाता है. धन की देवी श्री महालक्ष्मी जी की कृपा आशिर्वाद पाने के लिये इस दिन लक्ष्मी पूजन करने से लाभ एवं शुभ , मंगल सदैव बना रहता है माता लक्ष्मी जी चिर स्थाई कृपा रहती है।

वर्ष 2019 में दिपावली, 27 अक्टूबर, रविवार के दिन की रहेगी. इस दिन चित्रा नक्षत्र रात्रि 27:17 तक रहेगा. इस दिन विष्कुम्भ योग तथा चन्दमा तुला राशि में 16:32 मिनिट पर प्रवेश करेगा. दीपावली में अमावस्या तिथि, प्रदोष काल, शुभ लग्न व चौघाडिया मुहूर्त विशेष महत्व रखते है। दिपावली व्यापारियों, क्रय-विक्रय करने वालों के लिये विशेष रुप से शुभ मानी जाती है।

प्रदोष काल मुहूर्त कब

27 अक्टूबर 2019,रविवार में 17:40 से 20:16 तक प्रदोष काल रहेगा. इसे प्रदोष काल का समय कहा जाता है. प्रदोष काल समय को दिपावली पूजन के लिये शुभ मुहूर्त के रुप में प्रयोग किया जाता है. प्रदोष काल में भी स्थिर लग्न समय सबसे उतम रहता है. इस दिन 18:44 से 20:39 के दौरान वृष लग्न रहेगा. प्रदोष काल व स्थिर लग्न दोनों रहने से मुहुर्त शुभ रहेगा।

प्रदोष काल में पूजन कैसे करें

प्रदोष काल में मंदिर में दीपदान, रंगोली और पूजा से जुडी अन्य तैयारी इस समय पर कर लेनी चाहिए तथा मिठाई वितरण का कार्य भी इसी समय पर संपन्न करना शुभ माना जाता है।

इसके अतिरिक्त द्वार पर स्वास्तिक और शुभ लाभ लिखने का कार्य इस मुहूर्त समय पर किया जा सकता है. इसके अतिरिक्त इस समय पर अपने मित्रों व परिवार के बडे सदस्यों को उपहार देकर आशिर्वाद लेना व्यक्ति के जीवन की शुभता में वृ्द्धि करता है. मुहूर्त समय में धर्मस्थलो पर दानादि करना कल्याणकारी होगा।

निशिथ काल

निशिथ काल में स्थानीय प्रदेश समय के अनुसार इस समय में कुछ मिनट का अन्तर हो सकता है. 27 अक्टूबर को 20:16 से 22:52 तक निशिथ काल रहेगा. निशिथ काल में 17:40 से 19:18 तक की शुभ उसके बाद अमृत की चौघडिया रहेगी, ऎसे में व्यापारियों वर्ग के लिये लक्ष्मी पूजन के लिये इस समय की अनुकूलता रहेगी।

दिपावली पूजन में निशिथ काल में पूजन कैसे करें

धन लक्ष्मी का आहवाहन एवं पूजन, गल्ले की पूजा तथा हवन इत्यादि कार्य सम्पूर्ण कर लेना चाहिए. इसके अतिरिक्त समय का प्रयोग श्री महालक्ष्मी पूजन, महाकाली पूजन, लेखनी, कुबेर पूजन, अन्य मंन्त्रों का जपानुष्ठान करना चाहिए।

महानिशीथ काल

धन लक्ष्मी का आहवाहन एवं पूजन, गल्ले की पूजा तथा हवन इत्यादि कार्य सम्पूर्ण कर लेना चाहिए. इसके अतिरिक्त समय का प्रयोग श्री महालक्ष्मी पूजन, महाकाली पूजन, लेखनी, कुबेर पूजन, अन्य मंन्त्रों का जपानुष्ठान करना चाहिए।

27 अक्टूबर 2019 के रात्रि में 22:52 से 25:28 मिनट तक महानिशीथ काल रहेगा. इस समय के दौरान रोग और काल की चौघडियां अनुकूल नहीं हैं. लेकिन 22:51 से 25:14 तक के समय में कर्क लग्न और सिंह लग्न होना शुभस्थ है. इसलिए उक्त चौघडियों को भुलाकर यदि कोई कार्य प्रदोष काल अथवा निशिथकल में शुरु करके इस महानिशीथ काल में संपन्न हो रहा हो तो भी वह अनुकूल ही माना जाता है. महानिशिथ काल में पूजा समय चर लग्न में कर्क लग्न उसके बाद स्थिर लग्न सिंह लग्न भी हों, तो विशेष शुभ माना जाता है. महानिशीथ काल में कर्क लग्न और सिंह लग्न होने के कारण यह समय शुभ हो गया है. जो शास्त्रों के अनुसार दिपावली पूजन करना चाहते हो, वह इस समयावधि को पूजा के लिये प्रयोग कर सकते हैं ।

महानिशीथ काल का दिपावली पर पूजन कैसे करें

महानिशीथकाल में मुख्यतः तांत्रिक कार्य, ज्योतिषविद, वेद् आरम्भ, कर्मकाण्ड, अघोरी,यंत्र-मंत्र-तंत्र कार्य व विभिन्न शक्तियों का पूजन करते हैं एवं शक्तियों का आवाहन करना शुभ रहता है. अवधि में दीपावली पूजन के पश्चात गृह में एक चौमुखा दीपक रात भर जलता रहना चाहिए. यह दीपक लक्ष्मी एवं सौभाग्य में वृद्धि का प्रतीक माना जाता है.

चौघडिया – 27 अक्टूबर , 2019 –

17:40 से 19:18 तक शुभ
19:10 से 21:00 तक अमृत
21:00 से 22:30 तक चर

दिवाली पर्व तिथि व मुहूर्त

दिवाली 2019
27 अक्तूबर
लक्ष्मी पूजा मुहूर्त- 18:42 से 20:11
प्रदोष काल- 17:36 से 20:11
वृषभ काल- 18:42 से 20:37
अमावस्या तिथि आरंभ- 12:23 (27 अक्तूबर)
अमावस्या तिथि समाप्त- 09:08 (28 अक्तूबर)

दीपावली पूजा पर राशि अनुसार किस रंगके कपड़े पहनें

इस दीपावली आप अपने कपड़ों से लक्ष्मी को खुश कर सकते हैं और अपने घर आने को मजबुर कर सकते हैं। ऐसा तभी हो सकता है जब आप लक्ष्मी पूजा में राशि अनुसार कपड़े पहनें। ज्योतिष शास्त्र के अनुसार पूजा पाठ के साथ ही हमारे कपड़ों और सफलता में बहुत गहरा संबंध है। राशि अनुसार रंगों के कपड़े पहनने से हमें अपने कार्यों में सफलता मिलने की संभावना काफी हद तक बढ़ जाती है। अगर राशि अनुसार कपड़े पहनें तो आपको पूजा का पूरा फल मिलेगा।

जानें किस राशि के लोग कैसे कपड़ें पहनें

मेष और वृश्चिक- मेष और वृश्चिक राशि का स्वामी मंगल है और इस राशि के स्वामी का प्रिय रंग लाल है।  इसलिए इन राशि के लोग धन पाने के लिए लक्ष्मी पूजा करते वक्त लाल रंग या लाल रंग से संबंधित शेड वाले कपड़े पहनें।
वृष और तुला- वृष और तुला का ग्रह स्वामी शुक्र है इसका प्रिय रंग सफेद है इसलिए इन राशि वाले लोगों को अधिक से अधिक सफेद रंग की ड्रेस पहनना चाहिए और लक्ष्मी पूजा के लिए तो इस रंग को न भूलें। इसके साथ ही इस राशि वालों को हल्के शेड्स के कपड़े पहनना चाहिए।
मिथुन और कन्या- यह दोनों राशियां बुध ग्रह की हैं। बुध का प्रिय रंग हरा है। अगर इस राशि के लोग लक्ष्मी पूजा के समय हरे रंग के कपड़े या इससे संबंधित शेड पहने तो लक्ष्मी आपके घर से कहीं नहीं जाएगी।
कर्क- कर्क राशि के स्वामी चंद्र का प्रिय रंग सफेद होता है और ज्योतिष में बनने वाले धन योग में चंद्रमा का बहुुत बड़ा रोल है। इसलिए कर्क राशि के लोग अपने घर लक्ष्मी बुलाने के लिए इस रंग का उपयोग करें।
सिंह- अगर इस दीपावली पर सिंह राशि के लोग पीले और सुनहरे रंगों के कपडा़े पर ज्यादा ध्यान दे तो पैसा ही पैसा आएगा।
धनु और मीन- धनु और मीन राशि का ग्रह स्वामी गुरु है और इसका प्रिय रंग पीला है। अत: इस राशि के लोगों को पूजा में पीले रंग के परिधान पहनना चाहिए। इससे सफलता की काफी संभावना बढ़ जाती है।
मकर और कुम्भ- मकर और कुंभ राशि का स्वामी शनि है और शनि का प्रिय रंग नीला और गहरे रंग हैं। अत: इन राशि के लोगों को लक्ष्मी पूजा करते समय बैंगनी या नीले रंग के कपड़े पहनना चाहिए।

दीपावली पर मां लक्ष्मी को प्रसन्न करने के लिए विशेष पूजन अर्चन किया जाता है। ऐसा माना जाता है इस दिन मां लक्ष्मी की कृपा प्राप्त होने पर सालभर घर में पैसों से जुड़ी कोई समस्या नहीं रहती है। इसके साथ ही घर में सुख-समृद्धि बनी रहती है और सभी देवी-देवताओं की कृपा प्राप्त होती है। दीपावली पर लक्ष्मी पूजन के लिए कई नियम बताए गए हैं। इन्हीं नियमों में से एक हैं कि आपका आसन पवित्र और पूजन के लिए श्रेष्ठ होना चाहिए।

राशियों के अनुसार कैसे आसन का प्रयोग करना चाहिए।

लक्ष्मीजी के पूजन में आसन का प्रयोग भी महत्वपूर्ण होता हैं। राशिनुसार आप कैसे रंग के आसन का प्रयोग करें जानिए।
मेष एवं मंगल राशि वालों को केसरी या लाल ऊनी आसन श्रेष्ठ रहता है।
वृषभ एवं शुक्र वालों को सफेद ऊनी आसन का उपयोग करना चाहिए।

मिथुन एवं कन्या राशि के लोगों को हरा ऊनी आसन पूजन में उपयोग करना चाहिए।

कर्क राशि के लोगों को सफेद रंग का आसन पूजा के समय प्रयोग किया जाना चाहिए।

सिंह राशि वालों को लाल रंग के आसन का उपयोग करना चाहिए।

मकर एवं कुंभ राशि के लोगों को काले अथवा नीले आसन का प्रयोग करना उचित होगा।

धनु एवं मीन को पीले रंग के आसन का प्रयोग करना चाहिए।
अगर किसी व्यक्ति को राशि अनुसार बताए गए आसन न मिले तो वे कुश के आसन का प्रयोग ही करें।

दीपावली पर पूजन के लिए सामग्री

महालक्ष्मी पूजन में केसर, रोली, चावल, पान का पत्ता, सुपारी, फल, फूल, दूध, खील, बतासे, सिन्दूर, सूखे मेवे, मिठाई, दही गंगाजल धूप, अगरबत्ती दीपक रुई, कलावा, नारियल और कलश के लिए एक ताम्बे का पात्र चाहिए।

कैसे करें दीपावली पर पूजन की तैयारी

1.एक थाल में या भूमि को शुद्ध करके नवग्रह बनाएं या नवग्रह का यंत्र स्थापित करें. इसके साथ ही एक ताम्बे का कलश रखें, जिसमें गंगाजल, दूध, दही, शहद, सुपारी, सिक्के और लौंग आदि डालकर उसे लाल कपड़े से ढक कर उसपर एक कच्चा नारियल कलावे से बांध कर रख दें।

जहां पर नवग्रह यंत्र बनाया है, वहां पर रुपया, सोना या चांदी का सिक्का, लक्ष्मी जी की मूर्ति या मिट्टी के बने हुए लक्ष्मी-गणेश सरस्वती या ब्रह्मा, विष्णु, महेश आदि देवी देवताओं की मूर्तियां या चित्र सजायें।

कोई धातु की मूर्ति हो तो उसे साक्षात रूप मानकर दूध, दही और गंगाजल से स्नान कराकर अक्षत, चंदन का श्रृंगार करके फल-फूल आदि से सजाएं. इसके ही दाहिने ओर एक पंचमुखी दीपक अवश्य जलायें जिसमें घी या तिल का तेल प्रयोग किया जाता है।

दीवाली के दिन की विशेषता लक्ष्मी जी के पूजन से संबन्धित है. इस दिन हर घर, परिवार, कार्यालय में लक्ष्मी जी के पूजन के रूप में उनका स्वागत किया जाता है. दीवाली के दिन जहां गृहस्थ और कारोबारी धन की देवी लक्ष्मी से समृद्धि और धन की कामना करते हैं, वहीं साधु-संत और तांत्रिक कुछ विशेष सिद्धियां अर्जित करने के लिए रात्रिकाल में अपने तांत्रिक कर्म करते हैं.

दीपावली पर पूजा का विधान

घर के बड़े-बुजुर्गों को या नित्य पूजा-पाठ करने वालों को महालक्ष्मी पूजन के लिए व्रत रखना चाहिए. घर के सभी सदस्यों को महालक्ष्मी पूजन के समय घर से बाहर नहीं जाना चाहिए. सदस्य स्नान करके पवित्र आसन पर बैठकर आचमन, प्राणायाम करके स्वस्ति वाचन करें. फिर गणेशजी का स्मरण कर अपने दाहिने हाथ में गन्ध, अक्षत, पुष्प, दूर्वा, द्रव्य और जल आदि लेकर दीपावली महोत्सव के निमित्त गणेश, अम्बिका, महालक्ष्मी, महासरस्वती, महाकाली, कुबेर आदि देवी-देवताओं के पूजनार्थ संकल्प करें।

कुबेर पूजन करना लाभकारी होता है. कुबेर पूजन करने के लिये सबसे पहले तिजोरी अथवा धन रखने के संदूक पर स्वास्तिक का चिन्ह बनायें, और कुबेर का आह्वान करें।

सबसे पहले गणेश और अम्बिका का पूजन करें. फिर कलश स्थापन, षोडशमातृका पूजन और नवग्रह पूजन करके महालक्ष्मी आदि देवी-देवताओं का पूजन करें. पूजन के बाद सभी सदस्य प्रसन्न मुद्रा में घर में सजावट और आतिशबाजी का आयोजन करें।

आप हाथ में अक्षत, पुष्प, जल और धन राशि ले लें. यह सब हाथ में लेकर यह संकल्प मंत्र को बोलते हुए संकल्प कीजिए कि ‘मैं अमुक व्यक्ति अमुक स्थान और समय पर अमुक देवी-देवता की पूजा करने जा रहा हूं जिससे मुझे शास्त्रोक्त फल प्राप्त हो’. सबसे पहले गणेश जी और गौरी का पूजन कीजिए।

हाथ में थोड़ा-सा जल ले लें और भगवान का ध्यान करते हुए पूजा सामग्री चढ़ाएं. हाथ में अक्षत और पुष्प ले लें. अंत में महालक्ष्मी जी की आरती के साथ पूजा का समापन करें. घर पूरा धन-धान्य और सुख-समृद्धि हो जाएगा।

दीपावली पर सरस्वती पूजन करने का भी विधान है. इसके लिए लक्ष्मी पूजन करने के पश्चात मां सरस्वती का भी पूजन करना चाहिए।

दीपावली एवं धनत्रयोदशी पर महालक्ष्मी के पूजन के साथ-साथ धनाध्यक्ष कुबेर का पूजन भी किया जाता है. कुबेर पूजन करने से घर में स्थायी सम्पत्ति में वृद्धि होती है और धन का अभाव दूर होता है. इनका पूजन इस प्रकार करें।

कैसे करें बही-खाता पूजन

बही खातों का पूजन करने के लिए पूजा मुहुर्त समय अवधि में नवीन खाता पुस्तकों पर केसर युक्त चंदन से या फिर लाल कुमकुम से स्वास्तिक का चिन्ह बनाना चाहिए. इसके बाद इनके ऊपर ‘श्री गणेशाय नम:’ लिखना चाहिए. इसके साथ ही एक नई थैली लेकर उसमें हल्दी की पांच गांठे, कमलगट्ठा, अक्षत, दुर्गा, धनिया व दक्षिणा रखकर, थैली में भी स्वास्तिक का चिन्ह लगाकर सरस्वती मां का स्मरण करना चाहिए।

मां सरस्वती का ध्यान करें. ध्यान करें कि जो मां अपने कर कमलों में घटा, शूल, हल, शंख, मूसल, चक्र, धनुष और बाण धारण करती हैं, चन्द्र के समान जिनकी मनोहर कांति है. जो शुंभ आदि दैत्यों का नाश करने वाली है. ‘वाणी’ जिनका स्वरुप है, तथा जो सच्चिदानन्दमय से संपन्न हैं, उन भगवती महासरस्वती का मैं ध्यान करता हूं. ध्यान करने के बाद बही खातों का गंध, पुष्प, धूप, दीप, नैवेद्ध से पूजन करना चाहिए।

जहां पर नवग्रह यंत्र बनाया गया है. वहां पर रुपया, सोना या चांदी का सिक्का, लक्ष्मी जी की मूर्ति या मिट्टी के बने हुए लक्ष्मी-गणेश-सरस्वती जी की मूर्तियां सजायें. कोई धातु की मूर्ति हो तो उसे साक्षात रुप मानकर दूध, दही ओर गंगाजल से स्नान कराकर अक्षत, चंदन का श्रृंगार करके फूल आदि से सजाएं. इसके ही दाहिने और एक पंचमुखी दीपक अवश्य जलायें, जिसमें घी या तिल का तेल प्रयोग किया जाता है।

महालक्ष्मी पूजा का स्थान ईशान कोण

मत्स्य पुराण के अनुसार अनेक दीपकों से लक्ष्मीजी की आरती करने को दीपावली कहते हैं। धन-वैभव और सौभाग्य प्राप्ति के लिए दीपावली की रात्रि को लक्ष्मीपूजन के लिए श्रेष्ठ माना गया है। श्रीमहालक्ष्मी पूजन, मंत्रजाप, पाठ तंत्रादि साधन के लिए प्रदोष, निशीथ, महानिशीथ काल व साधनाकाल अनुष्ठानानुसार अलग-अलग महत्व रखते हैं। पूजा के लिए पूजास्थल तैयार करते समय दिशाओं का भी उचित समन्वय रखना जरूरी है।

दिशा: पूजा का स्थान ईशान कोण (उत्तर-पूर्व दिशा) की ओर बनाना शुभ है। इस दिशा के स्वामी भगवान शिव हैं, जो ज्ञान एवं विद्या के अधिष्ठाता हैं। पूजास्थल पूर्व या उत्तर दिशा की ओर भी बनाया जा सकता है।

रंग: पूजास्थल को सफेद या हल्के पीले रंग से रंगें। ये रंग शांति, पवित्रता और आध्यात्मिक प्रगति के प्रतीक हैं।

मूर्तियां:  देवी-देवताओं की मूर्तियां तथा चित्र पूर्व-उत्तर दीवार पर इस प्रकार रखें कि उनका मुख दक्षिण या पश्चिम दिशा की तरफ रहे।

कलश; पूजा कलश पूर्व दिशा में उत्तरी छोर के समीप रखा जाए

हवनकुंड या यज्ञवेदी का स्थान पूजास्थल के आग्नेय कोण (दक्षिण-पूर्व दिशा) की ओर रहना चाहिए।

दीप: लक्ष्मीजी की पूजा के दीपक उत्तर दिशा की ओर रखे जाते हैं।

बैठना: पूजा, साधना आदि के लिए उत्तर या पूर्व या पूर्व-उत्तर दिशा की ओर मुख करके बैठना उत्तम है।

तंत्रसाधना के लिए पश्चिम दिशा की तरफ मुख रखा जाता है।

श्रीयंत्र दीपावली में दक्षिणवर्ती शंख का विशेष महत्व है। इस शंख को विजय, सुख-समृद्धि व लक्ष्मीजी का साक्षात प्रतीक माना गया है। दक्षिणवर्ती शंख को पूजा में इस प्रकार रखें कि इसकी पूंछ उत्तर-पूर्व दिशा की ओर रहे। श्रीयंत्र लक्ष्मीजी का प्रिय है। इसकी स्थापना उत्तर-पूर्व दिशा में करनी चाहिए।

मंत्र: लक्ष्मीजी के मंत्रों का जाप स्फटिक व कमलगट्टे की माला से किया जाता है। इसका स्थान पूजास्थल के उत्तर की ओर होना चाहिए। श्री सूक्त या श्री आद्यशंकराचार्य द्वारा विरचित ‘श्री कनकधारा स्रोत’ का पाठ वास्तुदोषों को दूर करता है। दीपावली के दिन श्रीलक्ष्मी पूजन के पश्चात श्रीकनकधारा स्रोत का पाठ किया जाए तो घर की नकारात्मक ऊर्जा का नाश हो जाने से सुख-समृद्धि का मार्ग प्रशस्त होता है।

श्री भगवती महालक्ष्मी की कृपा प्राप्ति के लिए बीज मंत्र –

श्रीं ह्रीं श्रीं महालक्ष्म्यै नम:॥

श्री महालक्ष्मी का वैदिक मंत्र

ॐ श्रीश्चतेलक्ष्मीश्चपत्क्न्यावहोरात्रे पार्श्वे नक्षत्राणि रूपमश्विनौ व्यात्तम | इष्णन्निषाणामुम्मइषाण सर्वलोकम्मइषाण ||

ॐ ह्रीं श्रीं लक्ष्मीभ्यो नमः

ॐ श्रीं ह्रीं श्रीं कमले कमलालये प्रसीद प्रसीद ॐ श्रीं ह्रीं श्रीं महालक्ष्मयै नम:

ॐ श्री महालक्ष्म्यै च विद्महे विष्णु पत्न्यै च धीमहि तन्नो लक्ष्मी प्रचोदयात् ॐ

दीपावली की रात सिद्धियों की रात होती है। ये सिद्धियां प्राप्त करना आम जन के लिए अत्यधिक कठिन होता है। इस बात को ध्यान में रखते हुए यहां कुछ सरल उपाय दिए जा रहे हैं, जिन्हें दीपावली के अवसर पर अपना कर आम लोग भी अपने जीवन को सुखमय बना सकते हैं।

दीपावली के पूजन के दौरान संपूर्ण परिसर में दक्षिणावर्ती शंख से गंगाजल का छिड़काव करें, नारायण का वास बना रहेगा। जहां नारायण का वास हो, वहां लक्ष्मी स्वतः विराजमान हो जाती हैं।

दीपावली पूजन के पश्चात्‌ संपूर्ण परिसर में गुग्गुल का धुआं दें। यह बुरी आत्माओं और आसुरी शक्तिओं से रक्षा करता है।

पूजन के दौरान माता लक्ष्मी को बेलपत्र व कमल का फूल अवश्य चढ़ाएं। कुछ लोग कमल के फूल व बेलपत्र को केवल भगवान शिव हेतु उपयुक्त मानते हैं, जबकि बेलपत्र व कमल के फूल की माला लक्ष्मी को अर्पित करने से वैभव  की प्राप्ति होती है।

पूजन के पश्चात्‌ मध्य रात्रि में परिवारजनों के साथ बैठकर श्रद्धापूर्वक श्री विष्णुसहस्रनाम अथवा श्री गोपाल सहस्रनाम तथा श्री लक्ष्मी सहस्रनाम का 11 या कम से कम एक बार पाठ अवश्य करें।

साधक जिस मंत्र का जप नित्य करते हों, या जो उनका प्रिय मंत्र हो अथवा जिस मंत्र का जप वह भविष्य में करना चाहते हों, उसे दीपावली की रात सिद्ध कर सकते हैं। मध्य रात्रि में इस मंत्र का 108 या 11 या फिर कम से कम एक माला जप संबंधित देवी देवता का ध्यान करके करें। इससे मंत्र सिद्ध हो जाएगा तथा उसका प्रभाव कई गुना बढ़ जाएगा।

घर में भगवान विष्णु और माता लक्ष्मी के स्थायी वास के लिए दीपावली पूजन के समय श्री नारायण सूक्त व श्री सूक्त का पाठ अवश्य करें।

दीपावली पूजन में सोने के आभूषण या सिक्के का अधिक महत्व है। इसे पूजा स्थल पर रखकर कनकधारा स्तोत्र का पाठ करें, माता लक्ष्मी के आशीर्वाद से घर धन-धान्य और स्वर्णाभूषणां से भरा रहेगा। सोने के अभाव में चांदी का उपयोग भी कर सकते हैं।

दीपावली पूजन में भगवान कुबेर का पूजन अवश्य करें, घर अन्न-धन से भरा  रहेगा।

बहुत से विद्वान दीपावली की मध्य रात्रि में बगलामुखी मंत्र सिद्धि का परामर्श देते हैं। किंतु ध्यान रहे कि यह एक परम शक्तिशाली मंत्र है, इसलिए केवल गंभीर परिस्थितियों में और किसी योग्य गुरु की देखरेख में ही इसे सिद्ध करना चाहिए।

दीपावली के दिन वस्तुओं को लांघना अशुभ होता है। अतः इस अत्यधिक सावधानी बरतें। चौक-चौराहों को देखकर ही पार करें।

ऊपर वर्णित उपाय आम जन को ध्यान में रखकर बताए गए हैं। लोग पंडित, पुजारी या तांत्रिक या विद्वान से मार्गदर्शन लेकर अन्य साधनाएं भी कर सकते हैं। दीपावली का मुहूर्त एक दुर्लभ और प्रभावशाली मुहूर्त होता है। अतः हर व्यक्ति को इसका लाभ उठाना चाहिए।

महालक्ष्मी कहां रहती हैं

मधुर बोलने वाला, कर्तव्यनिष्ठ, ईश्वर भक्त, कृतज्ञ, इन्द्रियों को वश में रखने वाले, उदार, सदाचारी, धर्मज्ञ, माता-पिता की भक्ति भावना से सेवा करने वाले, पुण्यात्मा, क्षमाशील, दानशील, बुद्धिमान, दयावान और गुरु की सेवा करने वाले लोगों के घर में लक्ष्मी का स्थिर वास होता है।

जिसके घर में पशु-पक्षी निवास करते हों, जिसकी पत्नी सुंदर हो, जिसके घर में कलह नहीं होता हो, उसके घर में लक्ष्मी स्थायी रूप से रहती हैं।

जो अनाज का सम्मान करते हैं और घर आए अतिथि का स्वागत सत्कार करते हैं, उनके घर लक्ष्मी निश्चत रूप से रहती हैं।

जो व्यक्ति असत्य भाषण नहीं करता, अपने विचारों में डूबा हुआ नहीं रहता, जो घमंडी नहीं होता, जो दूसरों के प्रति प्रेम रखता है, जो दूसरों के दुख से दुखी होकर उसकी सहायता करता है और जो दूसरों के कष्ट को दूर करने में आनंद अनुभव करता है, लक्ष्मी उसके घर में स्थायी रूप से वास करती हैं।

जो नित्य स्नान करता है, स्वच्छ वस्त्र धारण करता है, जो दूसरी स्त्रियों पर कुदृष्टि नहीं रखता, उसके जीवन तथा घर में लक्ष्मी सदा बनी रहती हैं।

आंवले के फल में, गोबर में, शंख में, कमल में और श्वेत वस्त्र में लक्ष्मी का वास होता है।

जिसके घर में नित्य उत्सव होता है, जो भगवान शिव की पूजा करता है, जो घर में देवताओं के सामने अगरबत्ती व दीपक जलाता है, उसके घर में लक्ष्मी वास करती है।

जो स्त्री पति का सम्मान करती है, उसकी आज्ञा का उल्लंघन नहीं करती, घर में सबको भोजन कराकर फिर भोजन करती है, उस स्त्री के घर में सदैव लक्ष्मी का वास रहता है।

जो स्त्री सुंदर, हरिणी के समान नेत्र वाली, पतली कटि वाली, सुंदर केश श्रृंगार करने वाली, धीरे चलने वाली और सुशील हो, उसके शरीर में लक्ष्मी वास करती हैं।

जिसकी स्त्री सुंदर व रूपवती होती है, जो अल्प भोजन करता है, जो पर्व के दिनों में मैथुन का परित्याग करता है, लक्ष्मी उसके घर में निश्चित रूप से वास करती हैं।

जो सूर्योदय से पहले (ब्रह्म मुहूर्त में) उठकर स्नान कर लेता है, उस पर लक्ष्मी की कृपा सदा बनी रहती है।

जो गया धाम में, कुरुक्षेत्र में, काशी में, हरिद्वार में अथवा संगम में स्नान करता है, वह लक्ष्मीवान होता है।

जो एकादशी तिथि को भगवान विष्णु को आंवला फल भेंट करता है, वह सदा लक्ष्मीवान बना रहता है।

जिन लोगों की देवता, साधु और ब्राह्मण में आस्था रहती है, उनके घर में लक्ष्मी का स्थायी वास होता है।

जो घर में कमल गट्टे की माला, लघु नारियल, दक्षिणावर्त शंख, पारद शिवलिंग, श्वेतार्क गणपति, मंत्रसिद्ध श्री यंत्र, कनकधारा यंत्र, कुबेर यंत्र आदि स्थापित कर नित्य उनकी पूजा करता है, उसके घर से लक्ष्मी पीढ़ियों तक वास करती हैं।

धर्म और नीति पर चलने वाले तथा  कन्याओं का सम्मान करने लोगों के जीवन और घर में लक्ष्मी स्थायी रूप से वास करती हैं।

रविशराय गौड़
ज्योतिर्विद
(मंदसौर म प्र)


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