ज्योतिर्विद श्री रविशराय गौड़ से जानिये क्या है भाईदूज (भ्रातृ द्वितीया ) और कलम दवात पूजा की विधि

यमाय धर्मराजाय श्री चित्रगुप्ताय वै नमः

भाईदूज (भ्रातृ द्वितीया ) कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की द्वितीया तिथि को मनाया जाने वाला सनातन हिन्दू धर्म का अति पावन पर्व है जिसे यम द्वितीया भी कहते हैं।

बहन भाई के अटूट प्रेम एवं श्रद्धा का पर्व भाई दूज पर्व कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की द्वितीया तिथि को मनाया जाता है।  इसे यम द्वितीया भी कहा जाता है। भाई दूज का पर्व भाई बहन के रिश्ते पर आधारित पर्व है, भाई दूज दीपावली के दो दिन बाद आने वाला एक ऐसा उत्सव है, जो भाई के प्रति बहन के अगाध प्रेम और स्नेह को अभिव्यक्त करता है, इस दिन बहनें अपने भाईयों की खुशहाली के लिए कामना करती हैं।

आज का मुहूर्त

भाई दूज 29 अक्टूबर 2019
भाई दूज तिथि – मंगलवार, 29 अक्टूबर 2019
भाई दूज तिलक मुहूर्त – 13:11 से 15:23 बजे तक (29 अक्टूबर 2019)
द्वितीय तिथि प्रारंभ – 21:07 बजे से (अक्टूबर 2019 )
द्वितीय तिथि समाप्त – 21:20 बजे तक (अक्टूबर 2019 )

परात्पर पर ब्रह्म ,सर्वेश्वर ,अखिलब्रम्हाण्ड स्वामी सच्चिदानंदघन भगवान श्री चित्रगुप्त की असीम कृपा करुणा से प्रति वर्षानुसार मनाया जाने वाला पारंपरिक पर्व सनातन संस्कृति में सदैव पूर्ब काल से अति विशिष्ट धार्मिक महत्व के साथ मनाया जाता रहा है इस वर्ष यम द्वितीया , भाई दूज का पावन पर्व भगवान श्री चित्रगुप्त का पूजन के साथ दवात कलम (अक्षर तूलिका) का पूजन होगा

पंचोपचार , षोडशोपचार , पूजन कर स्तोत्र , चालीसा , मंत्र जप कर आरती करना चाहिए

कार्तिक शुक्ल द्वितीया को पूर्व काल में यमुना ने यमराज को अपने घर पर सत्कारपूर्वक भोजन कराया था। उस दिन नारकी जीवों को यातना से छुटकारा मिला और उन्हें तृप्त किया गया। वे पाप-मुक्त होकर सब बंधनों से छुटकारा पा गये और सब के सब यहां अपनी इच्छा के अनुसार संतोष पूर्वक रहे। उन सब ने मिलकर एक महान् उत्सव मनाया जो यमलोक के राज्य को सुख पहुंचाने वाला था। इसीलिए यह तिथि तीनों लोकों में यम द्वितीया के नाम से विख्यात हुई।
जिस तिथि को यमुना ने यम को अपने घर भोजन कराया था, उस तिथि के दिन जो मनुष्य अपनी बहन के हाथ का उत्तम भोजन करता है उसे उत्तम भोजन समेत धन की प्राप्ति भी होती रहती है।
पद्म पुराण में कहा गया है कि कार्तिक शुक्लपक्ष की द्वितीया को पूर्वाह्न में यम की पूजा करके यमुना में स्नान करने वाला मनुष्य यमलोक को नहीं देखता (अर्थात उसको मुक्ति प्राप्त हो जाती है)।

सनातन धर्मियो के साथ आज कायस्थ समाज इसी दिन अपने आराध्य देव भगवान श्रीचित्रगुप्त की पूजा के साथ आज अक्षर तूलिका दवात कलम की पूजा करते है। कायस्थ इस दिन कारोबारी बहीखातों की पूजा भी करते हैं।

लेखनी पूजन :
लेखनी (कलम) पर नाड़ा बाँधकर सामने की ओर रखें। निम्न मंत्र बोलकर पूजन करें :-
लेखनी निर्मिता पूर्वं ब्रह्मणा परमेष्ठिना ।
लोकानां च हितार्थाय तस्मात्तां पूजयाम्यहम्‌ ॥

‘ॐ लेखनीस्थायै देव्यै नमः’
गंध, पुष्प, पूजन कर इस प्रकार प्रार्थना करें :-

शास्त्राणां व्यवहाराणां विद्यानामाप्नुयाद्यतः ।
अतस्त्वां पूजयिष्यामि मम हस्ते स्थिरा भव ॥

मसीभाजन संयुक्तश्चरसि त्वम् ! महीतले |
लेखनी कटिनीहस्त चित्रगुप्त नमोस्तुते ||
चित्रगुप्त ! मस्तुभ्यं लेखकाक्षरदायकं |

कायस्थजातिमासाद्य चित्रगुप्त ! नमो स्तुते 

भगवान श्री चित्रगुप्त पूजन प्रतिदिन क्यो

ॐ नमों विचित्राय धर्म लेखकाय यमवाहिकाधिकारिणै म्ल्व्यूं जन्म सम्पत प्रलयं कथय कथय स्वाहा।
(मंत्र महार्णव)

अर्थ-हे चित्रगुप्त! आप धर्म को लिखने वाले हैं, यम के अधिकार को चलाने वाले हैं, आप ही के कहने पर जन्म, पालन और संहार होता है, मैं आपको प्रणाम करता हूँ।

यमलोक में गया प्राणी भगवान् चित्रगुप्त के वचनों से नरक को भोगता है, नरक भोगने के पश्चात जब वह पशु-पक्षी का जो रूप लेता है, वह ममता का स्थान होता है। अर्थात पालतू पशु-पक्षी बनकर मोह-माया में रहता है।

हम सनातन धर्मी हैं, हमारे लिए भगवान् विष्णु, भगवान् ब्रह्मा, भगवान् शिव तथा भगवान् चित्रगुप्त का पूजन, मंत्र जप और इनके सहस्रनाम का पाठ प्रतिदिन करना उचित है।

मनुष्यों के महिमा मंडन को त्यागना चाहिये।

हमारे लिये…

1-गर्भाधान, 2-पुंसवन,
3-सीमन्तोन्नयन, 4-जातकर्म,
5-नामकरण, 6-निष्क्रमण,
7-अन्नप्राशन, 8-चूड़ाकर्म
9-कर्णभेद 10-उपनयन,
11-वेदारम्भ, 12-समावर्तन,
13-विवाह, 14-आवस्थ्याध्यान,
15-श्रौतधान 16-अन्त्येष्टि

ये 16 संस्कार बताये गये हैं। इन्हीं 16 संस्कारों को करके हम अपने कल्याण की कामना करते हैं।

इन संस्कारों में जो पूज्य है वही हमारे आराध्य होना चाहिए अर्थात जिनकी पूजा नहीं होती है, उनकी पूजा क्यों विचार करे।

इन 16 संस्कारों में

नवग्रह की स्थापना में केतुग्रह के अधिदेवता के रूप में भगवान् चित्रगुप्त का पूजन किया जाता है।

हमें भगवान् विष्णु, भगवान् ब्रह्मा, भगवान् शिव ,चित्रगुप्त , गणेश , शक्ति इत्यादि परब्रम्ह स्वरूप भगवान के मूल स्वरूप की पूजा करनी चाहिए।घर के कमरों में भी इनका ही फोटो लगाना कल्याणकारी है।

ये मेरा परीक्षित है।

भगवान् चित्रगुप्त ने महादानी बलि को उत्पन्न किया…..

एक जुआरी था जूए में बहुत सा धन जीतकर वेश्यागमन के लिये मुद्रा, ताम्बूल, इत्यादि लेकर निकला, मार्ग में फिसल कर गिरा और अचेत हो गया।

चेतना आने पर उसे ग्लानि होने लगी, उसने मुद्रा, ताम्बूल उठाकर निकटस्थ शिव मंदिर जाकर शिव को चढ़ा कर वापस आ गया। पुनः बुरे कार्य से विमुख हो गया।

कुछ दिनों पश्चात दिवंगत हो कर यमलोक पहुँचा। यमराज ने उसे देखते ही कहा हे पापी! तुम घोर नरक में डालने योग्य हो। यह सुनकर जुआरी बोला हे भगवन् यद्यपि मैं पापी हूँ अगर मैंने कोई पुण्य किया हो तो उसे भी देख लीजिये।

इसे सुनते ही भगवान् चित्रगुप्त ने कहा! शिव के निमित्त जो सत्कर्म तुमने किया था, उसके लिये मैं तुम्हें 3 घटी (72 मिनट) के लिये इन्द्र बना रहा हूँ, इसमें संशय नहीं है।

तत्क्षण देवता उस जुआरी को ऐरावत पर बैठा कर इन्द्रलोक ले गये। देवगुरु बृहस्पति ने इन्द्र से कहा हे देवेन्द्र! भगवान् चित्रगुप्त के आदेश का पालन करने हेतु तुम 3 घटी के लिये कहीं अन्यत्र चले जाओ ये मेरी आज्ञा है। गुरु की आज्ञा का पालन करने हेतु इन्द्र अन्यत्र चले गये।

जुआरी भगवान् चित्रगुप्त के आदेश से देवेन्द्र बन गया, जिसे 100 अश्वमेध यज्ञ करके प्राप्त किया जाता है।

जुआरी सोचने लगा कि शिव के निमित्त जो सत्कर्म मैंने किया तो भगवान् चित्रगुप्त ने इन्द्र बना दिया। इस विचार से उसने ऋषियों को बुला कर, इन्द्रलोक की समस्त वस्तुएँ शिव का नाम लेकर दान कर दीं।

3 घटी पश्चात इन्द्र वापस आ गये और वह जुआरी यमलोक चला गया।

इन्द्र ने देवगुरु बृहस्पति से पूछा हे गुरु हमारी दिव्य वस्तु कौन चुरा ले गया ? देवगुरु बृहस्पति ने इन्द्र को यथावत बता दिया। इसे सुनकर इन्द्र यमराज के पास पहुँच कर बोले, हे यमराज जिसे इन्द्र पद का भोग के लिये भेजा गया था, उसने हमारी दिव्य वस्तुओं का दान करके हमारे साम्राज्य को नष्ट कर दिया है।

इसे सुनकर यमराज-भगवान् चित्रगुप्त से बोले हे चित्रगुप्त इसने दूसरे के धन का हरण किया है, इसे नरक भेज दीजिये।

भगवान् चित्रगुप्त ने यमराज के वचन को सुनकर कहा! यह इन्द्रलोक में भी शिव के निमित्त दान किया है। इसलिये यह नरक नहीं जायेगा।

यमराज ने सिर झुका कर भगवान् चित्रगुप्त के आदेश का पालन करते हुये, उस जुआरी को प्रह्लाद का पौत्र बनाया। उसका नाम बलि रखा गया, वह महायशस्वी महादानी बलि हुये। उन्होंने 100 बार इन्द्र को पराजित करके विष्णु को दान दे दिया।

महादानी बलि आज भी विद्यमान हैं। वह अगले सावर्णिक मनु के युग में देवेन्द्र बनेंगे।

संदर्भ-स्कन्दपुराण, माहेश्वरखण्ड।

सत्यसार–

1-जुआरी मृत्यु लोक का था।
2-इन्द्र देवलोक में हटे।
3-बलि पाताल में रहते हैं।

इससे स्पष्ट है कि भगवान् चित्रगुप्त का शासन मृत्युलोक, देवलोक तथा पाताललोक पर विद्यमान है।

संपूर्ण वैदिक वांग्मय में परात्पर परब्रह्म भगवान श्री चित्रगुप्त का विस्तृत विवरण हमें प्राप्त होता है एवं भगवान श्री चित्रगुप्त की शक्तियां भी बहुत दिव्य है अर्थात हम सभी को भगवान चित्रगुप्त का पूजन प्रतिदिन करना चाहिए
चाहे देवेन्द्र हों, देवगुरु बृहस्पति हों, अवतार आदि देव हों, ऋषि, देव तथा दानव हों, सभी भगवान् चित्रगुप्त द्वारा शासित हैं।

भगवान् चित्रगुप्त द्वारा कठपुतली की भाँति नचाये गये मनुष्य रूपी लोग आज मृत्युलोक में पूज्य बन गए है लेकिन हमारे लिए किसी भी भोग-अभोग को देने में सक्षम नहीं हैं।

सनातन धर्मावलंबयो आप सभी से विनम्र निवेदन है कि गम्भीरता से चिन्तन करें और सत्य को स्वीकार कर अपने जीवन को ईश्वर की कृपा प्राप्त करते हुये शीर्ष पर स्थापित करें।

रविशराय गौड़
ज्योतिर्विद

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